३. ईश्वर का गणित : VS ZERO
मानव स्वभाव है आंकलन करना , विवेचन और विश्लेषण करना मानव सदा से ही प्रकृति से प्रेरित रहा है इसी प्रेरणा में मानव ने जो पिंड स्वयं में पूर्ण अस्तित्व रखते थे उन्हें पूर्णांक की संज्ञा दी और गिनने की प्रक्रिया अर्थात वस्तु भेद प्रारम्भ हुआ इसी क्रम में प्राचीन विद्वानों ने एक ऐसी कल्पना की जो हमें रिक्त की ओर ले गयी और महँ गणितज्ञ आर्य भट्ट के माध्यम से जीरो का गणितीय अस्तित्व संसार के समक्ष प्रमाण में आया अव जरा इस जीरो ( ०) के विशेषणों का विवेचन करे –
( १ ) जीरो अर्थात सिफर का ना आदि है न अंत है यह स्वयंभू है और प्रत्येक गणितीय या भौतिक मापांक में यह स्वयं भू रूप से उपस्थित रहता है k = k+0+0+0……… or k = k-0-0-0
(२) जीरो अविभाज्य / अविखंडित है अर्थात ब्रह्माण्ड में कोई भी छोटा या बड़ा धन या ऋण कोई भी ऐसा अंक ज्ञात नहीं है जो जीरो को विभाजित कर सके क्यों की इसकी खासियत यह है की इसे किसी भी बड़ी से बड़ी या छोटी से छोटी संख्या से भाग दो यह अक्षय अखंड बना रहता है और जीरो ही रहता है 0/k =0
(३) कितना भी छोटा या बड़ा धन या ऋण कैसा भी मापांक हो जीरो गुणन की प्रक्रिया में सबको अपने अंदर समाहित ही कर लेता है और उन्हें भी अपने जैसा जीरो बना लेता है kx0 = 0 and -kx0 = 0
(४) जीरो प्रत्येक धन या ऋण मापांक के साथ बिना उस मापांक में परिवर्तन किये योग स्थापित करता है
K+ 0=k and -k+0=k
(५) जीरो किसी भी धन या ऋण मापांक से बिना उस मापांक को प्रभावित किये अलग भी हो जाता है और कितनी भी बार हो जाता है K-0=0 AND -K-0=0
(६) किन्तु यदि ० स्वयं से किसी मापांक को अलग करता है तो उस मापांक की प्रकृति अर्थात चिन्ह बदल देता है
O-K=-K
(७) यदि ० किसी को विभाजित करता है उसके अनगिनत खंड कर देता है अर्थात उसे अनंत कर देता है
K/0= INFINITY
उपरोक्त ७ विशेषण केवल जीरो के गणितीय प्रगुण ही नहीं अपितु वह सरगम है जिस पर ब्रह्माण्ड रुपी श्रष्टि गान का गीत निरंतर बज रहा है और ब्रह्माण्ड सहज धारा पा रहा है उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट सिद्ध है कि हम जिन गुणों और विशेषणों के आधार पर ईश्वर तत्व कि विवेचना करना चाहते है और मानते है कि जो ईश्वर है उसमे ये गुण अवश्य होने चाहिए जैसे ईश्वर अनादि अनंत है ईश्वर अविभाज्य / अविखंडित है , ईश्वर किसी का भी अच्छा या बुरा नहीं लेता , ईश्वर किसी को भी स्वयं में समाहित कर अपने जैसा बना सकता है , ईश्वर की कृपा यदि किसी को मिल जाये तो वो अनंत हो जाता है आदि ये समस्त गुण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में केवल एक ही तत्व में मिलते है जो है गणितीय जीरो तो क्या …..? ईश्वर जीरो है या जीरो ही ईश्वर है यहाँ पहली बात तो कुछ हद तक सही है कि ईश्वर जीरो है वास्तव में ईश्वर जीरो नहीं है किन्तु ईश्वर का मापांक जीरो अवश्य है किन्तु दूसरी बात कि जीरो ही ईश्वर है पूरी तरह निरर्थक और हास्यप्रद है क्यों कि हम सब जानते है कि जीरो ईश्वर नहीं है जीरो तो केवल जब कुछ भी शेष न बचे या रिक्त का गणिताय निरूपण है या हम कह सकते है कि रिक्त का गणितीय मापांक जीरो है जिसका प्रतीक चिन्ह ० है किन्तु यह सिद्ध हो चूका है कि इस गणिताय जीरो एवं ईश्वर के स्वभाव में सर्वत्र सम समानताएं है जो हमें ईश्वर तत्व तक ले जाने का मार्ग प्रशस्त कराती है
जीरो क्या है अभी और जानना होगा ?
जिसका कोई मान न हो या जो रिक्त हो उसके गणितीय निरूपण हेतु प्रयुक्त संज्ञा है जीरो या सिफर या नॉट जिसका प्रतीक चिन्ह है वृत्त =० वाल्टी में ४ आम थे उसमे से १-१ आम चार बार निकाला गया तो –
प्रश्न (१) क्या बचा ?
प्रश्न (२) कितने आम शेष बचे ?
यहाँ विचारणीय है कि क्या दोनों प्रश्नो का उत्तर समान है तो सामान्य बुद्धि से दोनों का एक ही उत्तर है जीरो किन्तु तार्किक विवेचन पर प्रश्न (२) कितने आम शेष बचे का उत्तर जीरो है क्यों प्रश्न द्वारा बाल्टी में शेष बचे आमो का मापांक पुछा गया है जो की विशुद्ध रूप से जीरो है किन्तु प्रश्न (१) क्या बचा ? तो अभी बहुत कुछ बचा है बाल्टी में हवा है , स्पेस है , स्वरुप है व् अन्य भी काफी कुछ पाया जा सकता है अब जरा गौर करें कि जब बाल्टी में आम नहीं डालें गए थे तो बाल्टी में आमों की मापांक =० थी अब जब बाल्टी में ४ आम डाले गए तो बाल्टी में आमों का मापांक =०+४=४ हो गया किन्तु जब बाल्टी में से चारोँ आम निकाल लिए गए तो बाल्टी में आमों का मापांक =० पुनः हो गया विवेचन से स्पष्ट है की पूर्ण संक्रिया में जीरो क्रिया से पूर्व भी उपस्थित था अब आमों को बाल्टी में डालने की ( योग ) प्रक्रिया हुयी तो आमों को प्रकट करने हेतु जीरो स्वयं अदृश्य हो गया और प्रकट हुआ आमों का मापांक =४ किन्तु जब ४ प्रकट हो रहा है जीरो तब भी उपस्थित है किन्तु छुपा हुआ है यही जीरो की महानता है कि प्राणी को प्रकट करने हेतु स्वयं छुप जाता है और जब क्रिया की समाप्ति हुयी अर्थात चारोँ आमों को निकाल लिया गया तो आमों की अनुपस्थित में जीरो पुनः प्रकट हो गया
सम्पूर्ण विवेचन से तीन मुख्य निष्कर्ष सिद्ध होते है –
(१) जीरो अनादि अविभाजित अखंड व् अनंत है जिसका अस्तित्व चिर स्थायी है
(२) सम्पूर्ण काल में जीरो क्रिया से पूर्व ( भूतकाल ) क्रिया के अंतर्गत ( वर्त्तमान काल ) एवं क्रिया के पश्चात ( भविष्य काल ) तीनो ही स्थितियों में चिरस्थायी उपस्थित रहता है अर्थात यह एक चिरस्थायी अस्तित्व है ( क्यों कि यदि क्रिया के सञ्चालन में यदि जीरो उपस्थित नहीं होगा तो क्रिया को संचालित होने हेतु क्षेत्र अर्थात स्पेस प्राप्त न हो सकेगा )
(३) जीरो को केवल अनुभूत किया जा सकता है भौतिक रूप से नहीं देखा जा सकता जैसे जब बाल्टी में जब चार आम है तो हम चार इकाई को देख पर रहे है हम उन्हें नापकर तोलकर छूकर सूंघकर भौतिक रूप से सारा कुछ कर पा रहे है क्यों कि ४ इकाई का भौतिक अस्तित्व है किन्तु जब चारो आम निकल लिए जाते है तो हम जीरो आम को न देख पा रहे है न छू पा रहे है ना नाप तोल कर पा रहे है किन्तु हम यह देख रहे है कि बाल्टी में अब कोई आम नहीं है तो हम महसूस कर पा रहे है कि जीरो आम है अर्थात आमों कि पूर्ण अनुपस्थिति को व्यक्त कर रहा है जीरो आम शायद यह जीरो हम बचपन से पढ़ते आ रहे है लेकिन वास्तविकता यह है कि तब हम जीरो को केवल रट लिए और याद कर लिए कि ४-४=० है किन्तु अब हम अनुभव कर सकते है कि वास्तव में जीरो क्या है कैसे है व् क्यों है और इस अनुभूति पर , इस बिंदु पर आकर हम पाते है कि जीरो व् ईश्वर पूरी तरह समान है किन्तु इसे अभी और समझने के लिए हमें ईश्वर के गणित से आगे जाकर ईश्वर कि ज्यामिति , ईश्वर की भौतिकी को जानना समझना होगा तब हममे वो पात्रता विक्सित हो पायेगी कि हम जीरो और शून्य के अति सूक्ष्म भेद को समझ पाएंगे जिस तरह वृत्त एवं गोला में समतल और ठोस होने का दो दिशाएं व् तीन दिशाएं होने का मुख्य भेद है ठीक इसी प्रकार जीरो और शून्य में भी अति सूक्ष्म भेद है यही भेद माया रुपी वो पर्दा है जिसके हैट जाने पर कोई रहस्य रहस्य न रह जायेगा और साक्षात्कार हो जाता है उससे जो परदे के पीछे है
